वाचिक

सितम्बर 10, 2007

एहि मेला में

Filed under: self — vaachik @ 8:04 पूर्वाह्न

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मेला केहनो हुअय, नीक होईत छैक. आनंद त अबितहि छैक, उत्साह सेहो. एकटा आउर कारण देल जा सकैछ, मेला स्मृति के पुनःजीवित करैत अछि. ई सबटा गप एखन करबाक आशय ई जे हम एहि बीच में दिल्ली पुस्तक मेला सं भ अयलहुं. उत्साह छल बेसी किताब किनबाक, मुदा से नहि भेल. एक त मेलाक स्वरूप छोट छलैक दोसर समयाभाव. तथापि जयबा-अयबा में रूपेश भाइ ओ सचिनक सान्निध्य नीक रहल.

मेला सं हमर जुड़ावक कारण सालक उत्तराद्धॆ में अबै वला दशमीक संदभॆ में बेसी रहैत अछि. ई नास्टैल्जिया सेहो थिक ओ कारण सेहो. दशमी में जा धरि पछवारि टोल में प्रतिमाक प्राण-प्रतिष्ठा नहि होइत छल हम सब हजारों फेरा लगा चुकल रहैत छलहुं. नाटकक कयक टा रिहसॆल क चुकल रहैत छलहुं. ता पर जखन षष्ठी दिन बेल-नोती अबैत छलैक त पहुंच जाति छलियैक बौअन या रांटी वालीक बेल तर. बौअन वला बेल अधिकांशतया बेल-नोतीक लेल उपयुक्त होइत छलैक कियैक त रांटी वालीक घर लगहक बेल में ‘ किछू बूरि ‘  लोकनिक हाथ लागि जाति छलैक. अस्तु, बेल-तोरीक प्रात जाहि दिन नाटकक पहिन दिन रहैत छलैक ओहि दिनक गप त जूनि पूछू. भोरे सं स्टेज पर जबदॆस्ती बांस पकड़ै में सहयोग देबाक रूटीन मोन नहि पड़ैछ जे कहिया सं चलैत आबि रहल छल. नाटक तीन दिन होइत छल. तकर बाद दशमी अबैत छलैक. ओहि दिन बाबूजी लालगंज चौक यानी पैटघाट में सबके जलेबी खूअबैत छलखिन्ह. किओ दू सय ग्राम, किओ चारि सय जकरा सं जतबा सक लगैत छलैक, जलेबी खा लैत छल. जा धरि खा क दोकान सं बहरायत छल तावत बुझू जे फलाना गामक ढिकानाजी सं जरूर बाबूजी के भेंट भ जाइत छलैन. तुरंत बजा लैत छलाह. यौ, हिनका गोर लगियौन्हु. ई अहांक फलाना हेताह. ई चलितहि रहैत छलैक कि एतबे में किओ दूरे सं चिचियैत छल. कुटुंब नमस्कार. आब लिय. ई महानुभाव सेहो औताह. बाबूजीक चेहरा चमकि जाति छल. कुटुंब सं गप शुरू भ जाइत छलैक. हम तीनू भाई ओ अन्यान्य पितिऔत सब छिटकि जाइत छलहुं विसजॆन देख लेल. छिटकै में एकटा गप रहैत छलैक. किशोरावस्था में छलहुं. मेला में खाली छौंड़ा सब टा नहि अबैत छलैक. आगू अंदाज अपने लगा लिय.

कुल जमा दशमीक मेला आनंददायक होइत छल. तखन जे आब कोनो मेला में जाइत छी अथवा भाग लेबाक मौका भेटैत अछि त मोन वयह पुरना बात सब पड़ैत अछि मुदा नया माहौलक नयापन स्मृति के बहा दैत छैक. हम एखन पुस्तक मेला ओ दशमीक मेला के तुलना नहि क रहल छी. मेलाक जे वातावरण आब ‘ मिस ‘  कर पड़ैत अछि ओ गप त अहां सं कहबे ने करब,  तकरे कोशिश क रहल छी.

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