वाचिक

अक्टूबर 29, 2007

संस्कृत कियैक

Filed under: Uncategorized — vaachik @ 9:26 अपराह्न

एहि बीच में मेरठ में संस्कृत भारतीक दू दिनी सम्मेलन भेल. हमहूं गेल छलहुं ओहि में. बाबूजीक एकटा कलीग आयल छलाह. बहुत दिनक बाद संस्कृत में संभाषण करबाक मौका भेटल. इच्छा त भेल जे मोन के प्रसन्न क ली. जे भाषा हमर बापक माध्यम सं हमर देह में शोणित भ क बहैत अछि तकरा लेल अपन अखबार में किछु करी. रिपोर्टिंग अथवा कोनो रिपोर्ताज. लेकिन रहि-रहि के हिंदी मोन पड़ि जाइत छल. हिंदी जे राष्ट्रभाषा थिक अपन सबहक. तखन कियैक संस्कृतक प्रचार-प्रसार संबंधी कोनो कार्यक्रम में गेलहुं, एहि उधेड़बुन में दू दिन सं पड़ल छलहुं. आई तक जखन किछु नहि फुरायल त ब्लाग भर चललहुं.

वस्तुतः संस्कृतक प्रचार-प्रसार आजुक समाज में व्यर्थ बुझना जाइछ अछि. कारण त कयक टा छैक. झलक ऊपर देबे कयलहुं. मुदा सबसं बेसी जे दुखी करैत अछि जे राष्ट्रभाषाक समानांतर अथवा ओहि सं ऊपर कोनो भाषाक रखबाक षड्यंत्रक. ई मात्र षड्यंत्र टा नहि छैक एकरा पाछू देशक समूचा व्यवस्थाक छिन्न-भिन्न कयनाई. सोचू, जखन अंग्रेजीक पाछां पागल भेल अजुका समाज बात-बात पर हिंदी के दोसरा नंबर पर ठार करैत रहैत अछि, तखन संस्कृत पढ़ि के निकलै वला समाज सेहो यैह करत. ई दुहू भाषा, जाहि में एकटा अतिप्राचीन ओ अखुनका परिदृश्य में लगभग अनुपयोगी भ चुकल अछि आ दोसर जे विदेशी मानसिकताक परिचायक ओ हावी होइत जा रहल अछि, तकर आगां हिंदीक कोन स्थान रहि जायत. गप ई नहि जे संस्कृत अथवा अंग्रेजी दोयम स्तर के भाषा थिक, मुदा जाहि भाषा या बोली में सबसे बेसी संप्रेषणक आधार बनैत होय, तकरा अपनेनाइ बेसी व्यावहारिक ओ जरूरी छैक. कियो महान जन कहि गेल छथि जे ..देश को एकसूत्र में बांधने के लिए हिंदी से उपयुक्त कोई दूसरी भाषा हो ही नहीं सकती… आब सोचू जे हिंदी के स्वीकार कयनाई आसान अछि अथवा ओकरा छोड़ि संस्कृत या अंग्रेजी के.

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