वाचिक

सितम्बर 17, 2007

मिथिलाक नाम पर

Filed under: Uncategorized — vaachik @ 8:12 अपराह्न

दू-तीन दिन पूवॆ कतेको रास मैथिल बंधु लोकनि दिल्ली में संसद भवन पर जमा भेलाह. काज छलन्हि मिथिला राज्य के अलग कर हेतु प्रदशॆन. आफिस में छलहुं तैं हुनकर लोकनिक फोटो आयल छल से देखलहुं. नीक लागल. बाद में खबरि सेहो आयल. पढ़ि के लागल जे बसिया तारी पिया रहल छथि. अखबारक कोनो पन्ना पर जगह यदि रहितैक त निश्चित रूपे सं खबरि छपितहुं. मुदा से नहि भेल तैं मेरठ में बैसि क मिथिला राज्य के संबंध में कोनो तरहक कोशिश करबाक एकटा छोट छिन प्रयास अपूणॆ रहि गेल.

                     मिथिला राज्य के ल क कोनो एहेन गप नहि अछि जे हम पूवॆ-आग्रह पोसने होय. तथापि लगति रहैत अछि जे एहि राज्य के बनबाक कोनो संभावना नहि. कियैक त राज्य बनेबा लेल जे सब सं जरूरी चीज होइत अछि राजनीति कयनाइ, से करबा में मैथिल बंधु लोकनि पाछू छथि. ओना राजनीति कखन कोन करोट फेरत तकरा बुझवा में कतेको गोटे के कइएक सदी लागि जाइत छनि. तखन इहो गप नहि जे मिथिला में राजनीति कर वला लोक नहि छथि. खूब छथि आ जमि के करैत छथि. मुदा एहि मुद्दा पर पता नहि कियैक हुनका सब के ठोर सुखा जाइत छनि. नहि मानी त एहि आंदोलन सं संबंधित कोनो बरखक वा दिनक अखबार उठा के देखि लिय, पता चलि जाइत. जहिया-जहिया मिथिला ले आंदोलन करबाक अवसर भेल गीनि के दू-चारि गोटे एकठाम जमा भ जाइत छथि, भाषण दैत छथिन कनेक काल आ मिथिला राज्यक लेल मरै-जीबै लेल समपॆण क लैत छथि. आश्चयॆ नहि जे एहि तरहें कयक साल सं मिथिला बनि के टूटि गेलीह. मुदा लोक सब ओहिना आंदोलन करैत रहि गेलाह.

               मोन पाड़ू झारखंड आंदोलन. कतेको राजनीतिक दांव-पेंच आ बलिदान (तथाकथित सही) द क अंततः झारखंड बनि गेल. लालू यादवक विरोध पटना में रहि गेलैन आ रांची राजधानी भ गेल. एहिना छत्तीसगढ़ ओ उत्तरांचल, आब उत्तराखंड के भेल. तात्पयॆ ई जे पहाड़ सं ल क आदिवासी क्षेत्रक लोक लड़ि सकैत अछि, मुदा हम मैदानी भाग वला सब ओहिना रहि गेलहुं. दुखी होयबाक गप नहि जे अपना सब लड़लहुं नहि. अपन सब के शोणित में लड़ैक माद्दा नहि अछि, ई विशेषता छी. लेकिन आब समय आबि गेल छैक जखन कि एकरा तरुआरि सं टघरै वला शोणित बना लेबाक चाही. कि हम किछु गलत कहलहुं…….

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सितम्बर 10, 2007

एहि मेला में

Filed under: self — vaachik @ 8:04 पूर्वाह्न

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मेला केहनो हुअय, नीक होईत छैक. आनंद त अबितहि छैक, उत्साह सेहो. एकटा आउर कारण देल जा सकैछ, मेला स्मृति के पुनःजीवित करैत अछि. ई सबटा गप एखन करबाक आशय ई जे हम एहि बीच में दिल्ली पुस्तक मेला सं भ अयलहुं. उत्साह छल बेसी किताब किनबाक, मुदा से नहि भेल. एक त मेलाक स्वरूप छोट छलैक दोसर समयाभाव. तथापि जयबा-अयबा में रूपेश भाइ ओ सचिनक सान्निध्य नीक रहल.

मेला सं हमर जुड़ावक कारण सालक उत्तराद्धॆ में अबै वला दशमीक संदभॆ में बेसी रहैत अछि. ई नास्टैल्जिया सेहो थिक ओ कारण सेहो. दशमी में जा धरि पछवारि टोल में प्रतिमाक प्राण-प्रतिष्ठा नहि होइत छल हम सब हजारों फेरा लगा चुकल रहैत छलहुं. नाटकक कयक टा रिहसॆल क चुकल रहैत छलहुं. ता पर जखन षष्ठी दिन बेल-नोती अबैत छलैक त पहुंच जाति छलियैक बौअन या रांटी वालीक बेल तर. बौअन वला बेल अधिकांशतया बेल-नोतीक लेल उपयुक्त होइत छलैक कियैक त रांटी वालीक घर लगहक बेल में ‘ किछू बूरि ‘  लोकनिक हाथ लागि जाति छलैक. अस्तु, बेल-तोरीक प्रात जाहि दिन नाटकक पहिन दिन रहैत छलैक ओहि दिनक गप त जूनि पूछू. भोरे सं स्टेज पर जबदॆस्ती बांस पकड़ै में सहयोग देबाक रूटीन मोन नहि पड़ैछ जे कहिया सं चलैत आबि रहल छल. नाटक तीन दिन होइत छल. तकर बाद दशमी अबैत छलैक. ओहि दिन बाबूजी लालगंज चौक यानी पैटघाट में सबके जलेबी खूअबैत छलखिन्ह. किओ दू सय ग्राम, किओ चारि सय जकरा सं जतबा सक लगैत छलैक, जलेबी खा लैत छल. जा धरि खा क दोकान सं बहरायत छल तावत बुझू जे फलाना गामक ढिकानाजी सं जरूर बाबूजी के भेंट भ जाइत छलैन. तुरंत बजा लैत छलाह. यौ, हिनका गोर लगियौन्हु. ई अहांक फलाना हेताह. ई चलितहि रहैत छलैक कि एतबे में किओ दूरे सं चिचियैत छल. कुटुंब नमस्कार. आब लिय. ई महानुभाव सेहो औताह. बाबूजीक चेहरा चमकि जाति छल. कुटुंब सं गप शुरू भ जाइत छलैक. हम तीनू भाई ओ अन्यान्य पितिऔत सब छिटकि जाइत छलहुं विसजॆन देख लेल. छिटकै में एकटा गप रहैत छलैक. किशोरावस्था में छलहुं. मेला में खाली छौंड़ा सब टा नहि अबैत छलैक. आगू अंदाज अपने लगा लिय.

कुल जमा दशमीक मेला आनंददायक होइत छल. तखन जे आब कोनो मेला में जाइत छी अथवा भाग लेबाक मौका भेटैत अछि त मोन वयह पुरना बात सब पड़ैत अछि मुदा नया माहौलक नयापन स्मृति के बहा दैत छैक. हम एखन पुस्तक मेला ओ दशमीक मेला के तुलना नहि क रहल छी. मेलाक जे वातावरण आब ‘ मिस ‘  कर पड़ैत अछि ओ गप त अहां सं कहबे ने करब,  तकरे कोशिश क रहल छी.

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